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भारत इस साल अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. More information औपनिवेशिक अतीत से पूरी तरह अलग हुआ.
हर साल होने वाली गणतंत्र दिवस की भव्य ब दिल्ली के ऐतिहासिक राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर होती है. इसमें सैन्य टैंक गुज़रते हैं, लड़ाकू विमान आसमान में गर्जना करते हैं और हज़ारों लोग इसे देखते हैं.
परेड अपने आप में अद्भुत होती है, लेकिन इस पर भी सबकी नज़र रहती है कि समारोह में सबसे अहम सीटों पर कौन बैठा है. More information एंटोनियो कोस्टा मौजूद रहेंगे.
भारत ने उन्हें मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया है. इससे यूरोपीय संघ को देश के सबसे प्रतिष्ठित राजकीय आयोजनों में से एक के केंद्र में रखा गया है.
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इस दिन भारत अपनी राजधानी के दिल को एक मंच में बदल देता है. हज़ारों सैनिक तालियों की गूंज के बीच मार्च करते हैं, बख़्तरबंद वाहन आगे बढ़ते हैं, जिसे पहले राजपथ या किंग्स एवेन्यू कहा जाता था. रंग-बिरंगी झांकियां दर्शकों के सामने से गुज़रती हैं.
दिल्ली में मौजूद लोग इन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखते हैं, जबकि देशभर में करोड़ों लोग स्क्रीन पर यह परेड देखते हैं.
परेड की अध्यक्षता भारत के राष्ट्रपति करते हैं. मुख्य अतिथि राष्ट्रपति के बगल में बैठते हैं. उनकी सीट राष्ट्रपति की कुर्सी के बेहद क़रीब होती है, यहां तक कि सरकार के सबसे वरिष्ठ अधिकारियों से भी ज़्यादा क़रीब.
परंपरा- जो भारत की प्राथमिकताएं बताती है
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भारत के राष्ट्रपति के पास कौन बैठता है, इसे नहीं माना जाता.
विशेषज्ञों के मुताबिक़, दशकों से मुख्य अतिथि का चयन इस बात का संकेत माना जाता रहा है कि भारत उस समय अपनी विदेश नीति में किन प्राथमिकताओं को महत्व दे रहा है और किन रिश्तों को सामने लाना चाहता है.
इस परंपरा की शुरुआत 1950 में हुई थी, जब More information पहले गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल हुए थे. में नए स्वतंत्र हुए देशों के साथ रिश्तों को प्राथमिकता दी. यह बात उस दौर के मुख्य अतिथियों के चयन में भी दिखती है.
इसके बाद से दुनियाभर के नेता इस परेड में शामिल होते रहे हैं. यह भारत के वैश्विक संबंधों और रणनीतिक प्राथमिकताओं में आए बदलावों को दर्शाता ै.
मुख्य अतिथियों में भूटान और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के नेता भी शामिल रहे हैं और अमेरिका व ब्रिटेन जैसी बड़ी शक्तियों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख भी.
ब्रिटेन पांच बार मुख्य अतिथि रहा है. इनमें महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय और प्रिंस फ़िलिप भी शामिल हैं. यह दोनों देशों के लंबे और जटिल रिश्तों को दर्शाता है.
फ्रांस और रूस (पहले सोवियत संघ) 1950 के बाद से लगभग पांच बार आमंत्रित किए जा चुके हैं. यह इन दोनों देशों के साथ भारत के पुराने रणनीतिक रिश्तों को दिखाता है.
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इतने अलग-अलग देशों के नेताओं के आने के बाद सवाल उठता है कि भारत साल गणतंत्र दिवस के लिए मुख्य अतिथि का चयन कैसे करता है.
मुख्य अतिथि के चयन की प्रक्रिया काफ़ी हद तक सार्वजनिक नज़रों से दूर रहती है. पूर्व राजनयिकों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, आम तौर पर इसकी शुरुआत विदेश मंत्रालय में होती है, जहां संभावित मेहमानों की एक सूची तैयार की जाती है.
इसके बाद अंतिम फ़ैसला प्रधानमंत्री कार्यालय लेता है और चुने गए देशों से औपचारिक संपर्क किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में कई महीने लग सकते हैं.
पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर भारतीय विदेश “रणनीतिक उद्देश्य, क्षेत्रीय संतुलन और किसी देश को पहले आमंत्रित किया गया है या नहीं, इन सब “”
अमेरिका में भारत के राजदूत रह चुके नवतेज सरना बताते हैं कि इस फ़ैसले में काफ़ी सोच-विचार होता है.
वह बताते हैं,” उन्होंने यह भी जोड़ा कि उस समय संबंधित देश के नेता की उपलब्धता भी बड़ी भूमिका निभाती है.
विदेश नीति विश्लेषक हर्ष वी पंत कहते हैं कि मुख्य अतिथियों की बदलती सूची दुनिया के साथ भारत के बदलते रिश्तों को दिखाती है.
“वह कहते हैं,” प्रतिनिधिमंडल को देखें, जिसके साथ उसका नेतृत्व आ रहा है, तो यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हम यूरोपीय संघ के साथ अपने जुड़ाव को और “”
उन्होंने यह भी कहा कि संभव है कि किसी व्यापार समझौते का एलान हो. इससे यह संकेत मिलेगा कि मौजूदा भू-राजनीतिक हालात को लेकर भारत और यूरोपीय समूह की सोच एक जैसी है.
यह ऐसे समय में हो रहा है जब भारत अमेरिका के है. यह बातचीत लगभग एक साल से चल रही है.
More than 50 minutes ज़्यादा है. इसमें रूस से तेल ख़रीदने को लेकर जुर्माने भी शामिल हैं. इससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आया है.
मुख्य अतिथि की मौजूदगी से मिलने वाला संदेश
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विशेषज्ञों की राय है कि मुख्य अतिथि का चयन भारत की प्राथमिकताओं के बारे में बताता है.
“पंत कहते हैं,” उस समय भारत की प्राथमिकताओं का अंदाज़ा देता है यह बताता है कि वह किस क्षेत्र पर ध्यान. देना चाहता है या क्या किसी ख़ास उपलब्धि को “”
उन्होंने यह भी कहा कि भारत ग्लोबल साउथ के साथ लगातार क़रीबी संबंध बनाए हुए है.
2018 आसियान के नेताओं को मुख्य अतिथि बनाया गया था.
पंत कहते हैं कि यह पहली बार था जब किसी क्षेत्रीय समूह को आमंत्रित किया गया. 25 min.
इसी तरह, अतिथि सूची में कुछ नामों की ग़ैर-मौजूदगी भी तनावपूर्ण रिश्तों को दिखाती है.
1965 अतिथि के तौर पर आए थे, 2015 बीच युद्ध के बाद पाकिस्तान को फिर कभी आमंत्रित नहीं किया गया. More information जाता है.
चिर्फ़ एक बार ख थे. इसके चार साल बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर युद्ध हुआ था.
भारत की गणतंत्र दिवस परेड अलग क्यों
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More information.
विश्लेषकों का कहना है कि भारत की परेड दुनिया See More अलग है. एक वजह यह है कि भारत में लगभग हर साल कोई न कोई विदेशी अतिथि होता है.
इसके अलावा ज़्यादातर देशों में ऐसी परेड सैन्य जीत की याद में होती हैं.
मिसाल के तौर पर रूस का ‘विक्ट्री डे’ दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी की हार की याद दिलाता है. फ़्रांस का ‘बैस्टिल डे’ फ़्रांसीसी क्रांति की शुरुआत और राजशाही के पतन का प्रतीक है. चीन की सैन्य परेड दूसरे विश्व युद्ध में जापान पर उसकी जीत को दर्शाती है.
पंत कहते हैं, इसके उलट भारत का उत्सव संविधान पर केंद्रित है.
“वह कहते हैं,” युद्ध में जीत से जुड़े होते हैं. “
पश्चिमी देशों की कई सैन्य परेड से अलग, भारत का गणतंत्र द्षमता के More information क्षेत्रीय झांकियों को भी जोड़ता है. इससे शक्ति और विविधता, दोनों का संदेश जाता है.
रणनीति और परेड अतिथियों पर अक्सर व्यक्तिगत असर भी छोड़ती है.
नाम न छापने की शर्त पर बात करने वाले पूर्व अधिकारी ने याद किया कि ओबामा परिवार ऊंटों पर सवार दस्तों से काफ़ी प्रभावित हुआ था. More information
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