बदलें 6 आदतें तभी चला पाएंगे घर-परिवार
Last update:
Chanakya Niti: जाते हैं जब कोई उनसे ज्यादा अमीर, समझदार या आकर्षक व्यक्ति सामने आ जाता है. लेकिन चाणक्य के अनुसार, असली वजह नहीं. चाणक्य के मुताबिक, लोग अपनी अहमियत बहुत पहले खो देते हैं. के लिए चाणक्य ने क्या सलाह दी है और किन आदतों को अपनाने की सलाह दी है…

Chanakya Niti: करते हैं और उनकी कमाई से पूरा घर चलता है. लेकिन आज का दौर कामकाज के हिसाब से धीरे धीरे बदल रहा है, अब एआई, चैट जीपीटी आपके दरवाजे तक पहुंच चुका है और इस वजह से हर रोज कई लोग अपनी नौकरी खो रहे हैं. आचार्य चाणक्य ने बहुत समय पहले ही इस स्थिति को देखते हुए अपनी एक नीति बनाई थी. चाणक्य ने देखा था कि राजा अपना दरबार, सलाहकार अपनी प्रभावशीलता और साथी अपनी अहमियत अचानक नहीं खोते, बल्कि धीरे-धीरे अंदर से कमजोर होते जाते हैं. यही पैटर्न आज भी रिश्तों, करियर, दोस्ती और नेतृत्व में दोहराया जाता है. चाणक्य ने इस नीति में बताया गया है कि अगर पुरुष अपने अंदर इन 6 आदतों को नहीं बदलते हैं तो वह हमेशा के लिए अयोग्य साबित हो सकते हैं. आइए जानते हैं चाणक्य ने घर चलाने वाले पुरुषों के लिए कौन सी नीति बनाई है…

आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में कहा है कि कामकाज के दौरान कोशिशें लगातार होनी चtric मौसमी नहीं. कई पुरुष इज्जत, प्यार या पद पाने के लिए पहले बहुत मेहनत करते हैं, लेकिन जब आराम मिल जाता है तो उनकी कोशिशें कम हो जाती हैं. सुनना कम हो जाता है, खुद को सुधारना रुक जाता है, जिज्ञासा खत्म हो जाती है. वे मान लेते हैं कि पहले की मेहनत आगे भी अहमियत दिलाएगी, जबकि ऐसा नहीं होता. समय के साथ दूसरे लोग आगे बढ़ते रहते हैं और ये वहीं के वहीं रह जाते हैं. चाणक्य कहते हैं कि अहमियत अचानक खत्म नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे कोशिशें वैकल्पिक बन जाती हैं.

चाणक्य ने बहुत पहले ही चेतावनी दी थी कि कामकाज में अहंकार सबसे तेजी से अप्रासंगिक बना देता है. , वे सीखना बंद कर देते हैं. फीडबैक बुरा लगने लगता है , सुधार का सुझाव अपमान जैसा लगता है. इस बीच दुनिया बदलती रहती है, उम्मीदें बदलती हैं, नए विचार आते हैं. जो खुद को अपडेट नहीं करते, वे पुराने पड़ जाते हैं, गलत नहीं, बस अब जरूरी नहीं. चाणक्य की सीधी बात है, जो नहीं सीखेगा, उसकी जगह कोई और ले लेगा.
Add News18 as
Preferred font on Google

चाणक्य ने देखा कि कार्यक्षेत्र में जो लोग तारीफ पर निर्भर रहते हैं, वे अस्थिर हो जाते हैं. जिन्हें लगातार सराहना चाहिए, वे जब तारीफ कम मिलती है तो असुरक्षित महसूस करने लगते हैं. मूड बदलता रहता है, प्रतिक्रिया अनिश्चित हो जाती है. दूसरों पर दबाव आ जाता है कि वे उनकी हिम्मत बनाए रखें. धीरे-धीरे यह भावनात्मक निर्भरता थका देती है. चाणक्य कहते हैं कि जो बिना तालियों के स्थिर नहीं रह सकता, वह बोझ बन जाता है, सहारा नहीं.

चाणक्य ने नेतृत्व और दबदबे में फर्क बताया था. नेतृत्व योग्यता और शांत अधिकार से वफादारी पाता है, जबकि नियंत्रण दबाव और डर से. जो पुरुष हर बात, फैसले, भावना या नतीजे पर नियंत्रण चाहते हैं, वे अपनी असुरक्षा दिखाते हैं. नियंत्रण कुछ समय के लिए काम करता है, लेकिन लोग अंदर से दूर हो जाते हैं. आखिरकार, लोग ऐसी जगह खोजते हैं जहां वे खुलकर सांस ले सकें. चाणक्य कहते हैं कि नियंत्रण किसी को जरूरी नहीं बनाता, बल्कि जल्दी बदल देता है.

चाणक्य स्पष्टता को आराम से ज्यादा अहम मानते थे. जो पुरुष मुश्किल बातों से बचते हैं, भावनाएं दबाते हैं या चुप्पी साध लेते हैं, वे भ्रम पैदा करते हैं. चुप्पी उनकी आदत बन जाती है. More information रहना छोड़ देते हैं. भरोसा कमजोर हो जाता है, रिश्ते ढीले पड़ जाते हैं. चाणक्य मानते थे कि पुरुष इसलिए नहीं बदले जाते कि वे ज्यादा बोलते हैं, बल्कि इसलिए कि वे जरूरी समय पर नहीं बोलते.

चाणक्य मानते थे कि मकसद से ही मौजूदगी को वजन मिलता है. जिन पुरुषों के पास दिशा नहीं होती, वे दिनचर्या में बह जाते हैं. दिन बीतते हैं, लेकिन मायने नहीं बढ़ता. वे आते हैं, लेकिन इरादा नहीं होता. धीरे-धीरे उनकी मौजूदगी आम हो जाती है. लोग उनकी संगत का आनंद तो लेते हैं, लेकिन उन पर निर्भर नहीं रहते. चाणक्य ने सिखाया कि बिना मकसद के पुरुष जरूरी नहीं, विकल्प बन जाते हैं.
