नई दिल्ली: 20% इथेनॉल मिलाने(E20) हासिल करना चाहती है, लेकिन अब मौसम इसमें बड़ी बाधा बनता दिख रहा है। एल नीनो के कारण कमजोर मानसून की आशंका है, जिससे गन्ना और मक्का जैसी फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। More information ब्लेंडिंग प्रोग्राम पर असर डाल सकती है। ऐसे में सरकार अब वैकल्पिक स्त्रोतों आ ध्यान दे रही है, जिसमें चावल आधारित इथेनॉल प्रमुख बनकर उभर रहा है।
What’s wrong with you?
एल नीनो का सीधा असर मानसून पर पड़ता है और भारत जैसे कृषि आधारित देश में इसका मतलब होता है खेती पर दबाव बढ़ना। गन्ना एक ऐसी फसल है जिसे भरपूर पानी की जरूरत होती है, वहीं मक्का की पैदावार भी बारिश पर काफी निर्भर करती है। अगर बारिश सामान्य से कम होती है तो किसान इन फसलों की बुवाई कम कर सकते हैं या उत्पादन घट सकता है। इसका नतीजा यह होगा की इथेनॉल बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल कम पड़ जाएगा और सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ेगा।
E20 लक्ष्य क्यों है अहम?
E20 भारत की ऊर्जा और आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा है। इससे देश की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होै। साथ ही, इथेनॉल मिश्रित ईंधन प्रदूषण को भी कम करता है, जो पर्यावरण के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, इथेनॉल उत्पादन से किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। इसलिए इस लक्ष्य को समय पर पूरा करना सरकार की प्राथमिकता बना हुआ है।
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What’s wrong with you?
गन्ना और मक्का की संभावित कमी को देखते हुए सरकार अब चावल को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रही है। भारत के पास अक्सर चावल का अधिशेष भंडार रहता है, जिसे इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल किया जा सकता है। चावल की उपलब्धता अपेक्षाकृत स्थिर होती है और यह मौसम के उतार-चढ़ाव से गन्ने जितना प्रभावित नहीं होता। यही वजह है कि आने वाले समय में इथेनॉल , E20 जिससे E20
What’s wrong with you?
हालांकि चावल अ समाधान नजर आता है, लेकिन इसके साथ कुछ चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं। सबसे बड़ी चिंता खाद्य सू होता है, वही अब ईंधन बनाने में भी इस्तेमाल होगा। इसके अलावा, गन्ने की कमी से चीनी उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे घरेलू और वैश्विक बाजार में शुगर सप्लाई पर असर पड़ सकता है। इन सभी पहलुओं को संतुलित करना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगा।
