What’s wrong with you? अब एक सीट तय करेगी कुशवाहा के बेटे का राजनीतिक भविष्य & more related news here

What’s wrong with you? अब एक सीट तय करेगी कुशवाहा के बेटे का राजनीतिक भविष्य

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डिजिटल डेस्क, पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों विधान परिषद चुनाव को लेकर हलचल तेज है। RLM (RLM) मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर नए राजनीतिक सवाल खड़े हो गए हैं।

एनडीए द्वारा विधान परिषद की नौ सीटों के लिए घोषित उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम नहीं होने से उनके मंत्री पद के भविष्य को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

दरअसल, दीपक प्रकाश इस समय बिहार सरकार में परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं।

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भारतीय संविधान के अनुसार किसी व्यक्ति को More information ऐसा नहीं होने पर उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।

दिलचस्प बात यह है कि दीपक प्रकाश की तरह बिना किसी सदन के सदस्य बने मंत्री बनाए गए निशांत कुमार को जदयू ने विधान परिषद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है।

इससे उनका उच्च सदन पहुंचना लगभग तय माना जा रहा है। लेकिन दीपक प्रकाश का नाम उम्मीदवारोँ सूची में नहीं होने से उनके सामने राजनीतिक और संवैधानिक दोनों तरह की चुनौती खड़ी हो गई है।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा थी कि आरएलएम कोटे से दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजा जाएगा, लेकिन भाजपा, जदयू और लोजपा (रामविलास) के उम्मीदवारों की घोषणा के बाद तस्वीर बदल गई।

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एनडीए ने घोष‍ित क‍िए 9 उम्‍मीदवार

एनडीए ने नौ सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, जिनमें भाजपा के चार, जदयू के चार और लोजपा (रामविलास) के एक उम्मीदवार शामिल हैं।

अब दीपक प्रकाश की उम्मीदें उस अतिरिक्त सीट पर टिकी हैं, जिस पर मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है।सूत्रों की मानें तो एनडीए अभी अंतिम रणनीति पर विचार कर रहा है और दीपक प्रकाश को दसवें उम्मीदवार के रूप में उतारने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

More information बल्कि एनडीए के भीतर सहयोगी दलों के संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।

क्‍या आरएलएम को लगेगा झटका

उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को सरकाऱ प्रतिनिधित्व मिला है, लेकिन यदि दीपक प्रकाश को विधान परिषद का रास्ता नहीं मिलता है तो यह आरएलएम के लिए राजनीतिक झटका माना जाएगा।

फिलहाल नजरें एनडीए की अगली रणनीति और उस आखिरी सीट पर टिकी हैं, जो दीपक प्रकाश आ राजनीतिक भविष्य का फैसला कर सकती है।

यदि उन्हें समय रहते सदन की सदस्यता नहीं मिलती है तो संवैधानिक प्रावधानों के तहत उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है।

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